Four Stages of Spiritual Growth – discipline, self-education, abstinence, service

आखिर समाज हैं क्या ? समाज व्यक्तिओ का समूह मात्र हैं| व्यक्ति जेसे होंगे वेसा ही तो समाज बनेगा| समाज कोई अलग चीज नहीं है | वरन व्यक्तिओ के समूह का नाम हैं| इसलिए व्यक्तियों को श्रेस्ठ बनाने का मतलब है समय को अच्छा बनाना और समय को अच्छा बनाने का मतलब है युग के प्रवाह को बदल देना युग का प्रवाह “बदल देना” अर्थात समाज को बदल देना, यही हमारा उदेश्य है | इसी क्रिया-कलाप के लिए और इसी परिवर्तन के लिए हम लोग हुए है और युग परिवर्तन का जो नारा लगते हैं, उसका मतलब ही यह है की हम युग बदलेंगे, समाज बदलने और यक्ति बदलेंगे, समाज बदलेंगे, और यक्ति बदलेंगे| बदलने के लिए हम व्यापक क्षेत्र में प्रयोग  करते हैं, ताकि इसकी देखा-देखि इसका अनुकरण करते हुए अन्यत्र भी यही परंपराए चले, अन्यत्र भी इसी तरीके से क्रिया-कलाप चालू किये जा सके| बहार की परिस्थितियां मन की स्थिति के ऊपर निर्भर है| मन जेसा ही हमारा होता हैं, परिस्थितियाँ उसी के अनुरूप बनानी शुरू हो जाती हैं | हम इछाये करते हैं, इच्छाओ से हमारा मस्तिष्क कम करता हैं| मस्तिष्क की गणनाओ से शारीर कम करता हैं | शारीर और मस्तिष्क दोनों ही हमारी अंतरात्मा की प्रेरणा से काम करते हैं| इसीलिए जरुरत इस बात की पड़ी की हमारी आंतरिक अस्थाओ को, आंतरिक मान्यताओ को, निष्ठाओ को परिवर्तित कर दिया जाये जो जीवन का सारा का सारा ढांचा ही बदल जायेगा|

मनुष्य के सामने असंख्य समस्याए है और उन असंख्य समस्याओ का समाधान केवल इस बात पर टिका हुआ हैं की हमारी आंतरिक स्थिति सही बना दी जाये. द्रष्टिकोण हमारा गलत होती हैं, तो हमारे क्रिया-कलाप गलत होते हैं और गलत क्रिया-कलापों के परिणामस्वरूप जो प्रतिक्रियाए होती हैं, जो परिणाम सामने आते हैं, वे भयंकर दुखदाई होते हैं, कष्टकारक होते हैं| कष्टकारक परिस्थितियों के निवारण करने के लिए आवयशक है कि मनुष्य का चिंतन और द्रष्टिकोण बदल दिया जाये, परिष्कृत कर दिया जाये| यही हैं हमारे प्रयास जिसके लिए हम अपनी समस्त शक्ति के साथ लगे हुए हैं |

मनुष्य के आंतरिक उत्थान, आंतरिक उत्कर्ष, आत्मिक विकास के लिए क्या करना चाहिए और केसे करना चाहिए? इसका समाधान करने के लिए हमको चार बाते तलाश करनी पड़ती हैं| इन्ही चार चीजो के आधार पर हमारी आत्मिक उन्नति टिकी हुई हैं और वे चार आधार हैं – साधना, स्वाध्याय, संयम, और सेवा | ये चारो इसे हैं जिनमें से एक को भी आत्मोत्कर्ष के लिए छोड़ा नहीं जा सकता | इनमे से एक भी एसा नहीं है जिसके बिना हमारे जीवन का उत्थान हो सके | चारो आपस में अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं, जिस तरीके के कई तरह कि चोकदियाँ आपस में जुडी हुई हैं – मसलन बिज एक, जमीन दो, खाद-तिन, पानी चार | चरों जब तक नहीं मिलेंगे कृषि नहीं हो सकती | उसका बढ़ना संभव नहीं हैं | व्यापार के लिए अकेली पूंजी से काम नहीं चल सकता | इसके लिए पूंजी-एक, अनुभव-दो, वस्तुओं कि मांग-तिन, ग्राहक-चार | इन चारो को आप ढूंड लेंगे तो व्यापार चलेगा और उसमे सफलता मिलेगी | माकन बनाना हो तो उसके लिए इंट, चुना, लोहा लकड़ी इन चारो चीजो कि जरुरत हैं | चारो में से एक भी चीज अगर कम पड़ेगी तो हमारी ईमारत नहीं बन सकती | सफलता प्राप्त करने के लिए मनुष्य का कोशल आवश्यक हैं, साधन आवश्यक हैं, सहयोग आवश्यक हैं और अवसर आवश्यक हैं | इन चारो चीजो में से एक भी कम पड़ेगी तो समझदार आदमी भी सफलता नहीं प्राप्त कर सकेगा – सफलता रुकी रह जाएगी | जीवन-निर्वाह के लिए भोजन, विश्राम, मल विसर्जन और श्रम उपार्जन चारो कि आवश्यकता होती हैं | ये चारो क्रियाएँ होंगी तभी हम जिन्दा रहेंगे | यदि इनमे से एक भी चीज कम पड़ जाएगी तो आदमी का जीवन रहना मुश्किल पड़ जायेगा | ठीक इसी प्रकार से आत्मिक जीवन का विकास करने के लिए – आत्मोत्कर्ष के लिए चरों का होना आवश्यक हैं, अन्यथा यक्ति निर्माण का उपदेश्य पूरा न हो सकेगा |

अब हम चारो चीजो के ऊपर प्रकाश डालते हैं | पहली हैं उपासना पल्स साधना | उपासना और साधना – इन दोनों को मिलकर एक पूरी चीज बनती है | उपासना का अर्थ है – भगवन पर विश्वास, भगवन कि समीपता | उपासना पाने भगवन के पास बेठना-नजदीक बेठना | इसका मतलब यह हुआ कि उसकी विशेषता हम अपने जीवन में धारण करे-जेसे आक के पास हम बैठते हैं, तो आग कि गर्मी से हमारे कपडे गरम हो जाते हैं, हाथ गरम हो जाते हैं, शारीर गरम हो जाता है| पास बेठने का यही लाभ होना चाहिए| बरफ्ह के पास बैठते हैं, कपडे ठन्डे हो जाते हैं | पानी में बरफ डालते हैं तो पानी ठंडा जो जाते हैं | ठंडक के नजदीक जाने से हमें ठंडक मिलनी चाहिए| गरमी कि समीपता से गरमी मिलनि चाहिए | संगुधित चीजो से सुगंध मिलनी चाहिए | चन्दन के समीप उगने वाले पोधे सुगन्धित हो जाते हैं – उनकी समीपता कि वजह से | यही वास्तविक हैं| उपश्ना का अर्थ यह हैं कि हम भगवन का भजन करे, नाम ले, जप करे, ध्यान करे, पर साथ साथ हम इस बात के लिए भी कोशिश करे कि हम भगवन के नजदीक आते जाये| भगवन हमारे में समाविष्ट होता जाये और हम भगवन में समाविष्ट होते जाये अर्थात दोनों एक हो जाये | एक होने से मतलब यह है कि दोनों कि इच्छाएँ, दोनों के द्रष्टिकोण एक जेसे रहे| हमको इश्वर जेसा बनने का प्रयतन करना चाहिए | इश्वर जेसे बने न कि उस पर हुकुम चलाये, और उनको यह आदेश दे कि आपको एसा करना चाहिए | उपासना का तात्पर्य अपनी मनोभूमि को इस लायक बनाना है कि हम भगवन के अग्यानुवर्ती और क्रियापद्धति को ढल सके | उपासना-भजन इसीलिए किया जाता हैं |

साधना- साधना का अर्थ है कि अपने गुण-कर्म-स्वभाव को साथ लेना | वस्तुत: मनुष्य चोरासी लाख योनियो में घूमते-घूमते उन सारे के सारे प्राणियों के कुसंस्कार अपने भीतर जमा करके ले आया है, जो मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक नहीं हैं, बल्कि हानिकारक हैं| तो भी स्वभाव के अंग बन गये हैं, और हम मनुष्य होते हुए भी पशु-संस्कारो से प्रेरित रहते हैं और पशु-प्रवृतियों को अहुधा अपने जीवन में कार्यान्वित करते रहते हैं | इस अनपढ़पन को ठीक कर लेना, सुगढ़पन का अपने भीतर से विकास कर लेना, कुसंस्कारों को जो पिचली योनियो के करण हमारे भीतर जमे हुए हैं, उनको निरस्त कर देना और अपना स्वभाव इस तरह का बना लेना, जिसको हम मानवोचित कह सके – साधना हैं | साधना के लिए हमको वाही क्रिया-कलाप अपनाने पड़ते हैं जो कि एक कंसस्कारी घोड़े या बेल को सुधारने के लिए उसके मालिको को करने पड़ते हैं-हल में चलने के लिए और गाड़ी में चलने के लिए | कुसंस्कारों को दूर करने के लिए हमको लगभग उसी तरह से प्रयतन करने पड़ते हैं जेसे कि सर्कस के पशुओ को पलते हुए उन्हें इस लायक बनाते हैं के वे सर्कस में तमाशा दिखा सके | इसी तरह के प्रयतन हमको अपने गुण-कर्म-स्वभाव के विकास के परिष्कार के लिए करने पड़ते हैं | कच्ची धातुओ को जिस तरीके से आग में तप करके उनको शुद्ध-परिष्कृत बनाया जाता हैं, जेवर आभूषण बनाये जाते हैं, उसी तरीके से हमारा कच्चा  जीवन कुंसंस्क्रत बनाया जाये कि हम ढली हुई धातु के आभूषण के तरीके से अथवा ओजार-हथियार के तरीके से दिखाई पड़े| जंगली झाड़ियो को काटकर के माली लोग अच्छे अच्छे झड और खुबसूरत पार्क बना देते हैं | हमको भी अपने झाड-झंखाड़ जेसे जीवन को परिष्कृत करके कांट-छांट करके समुन्नत करके इस लायक बनाना चाहिए कि जिसको कहा जा सके कि वह सभ्य और सुसंस्कृत जीवन हैं |

इसके लिए हमको नित्य ही आत्मनिरीक्षण करना चाहिए | अपनी गलतियो पर गोर करना चाहिए| उनको सुधारने के लिए कमर कसनी चाहिए और अपने आपका निर्माण करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए और अपने आपका निर्माण करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए और जो कमियाँ हमारे स्वभाव के अन्दर हैं, उन्हें दूर करने के लिए जुटे रहना चाहिए | आत्मा-विकास इसका एक हिस्सा हैं | हमको अपनी संकीर्णता में सिमित नहीं रहना चाहिए | अपने अहं को और अपनी स्वार्थपरता को, अपने हितो को व्यापक द्रष्टि से बाँट देना चाहिए | दुसरो के दुःख हमारे दुःख हों, दुसरो के सुखु में हम सुखी रहे, इस तरह कि व्रतियो का हम विकास कर सकें तो कहा जायेगा कि हमने जीवन साधना करने के लिए जितना प्रयास किया, उतनी सफलता पाई| साधना से सिद्धि कि बात प्रख्यात हैं | जीवन कि साधना से सिद्धि में भी किसी प्रकार के संदेह कि गुंजाईश नहीं हैं | अन्य किसी बात में तो संदेह कि गुंजाईश भी हैं, देवी-देवताओं कि उपासना करने पर हमको फल मिले, न मिले, कह नहीं सकते, लेकिन जीवन कि साधना करने का परिणाम निश्चित रूप से भोतिक और अध्यात्मिक दोनों ही जीवनों में लाभ के रूप में देखा जा सकता हैं | यह साधना के बारे में निवेदन किया गया|

दूसरा है – स्वाध्याय| मन कि मलिनता को धोने के लिए स्वाध्याय अति आवश्यक हैं| द्रष्टिकोण और विचार प्राय: वाही जमे रहते हैं हमारे मस्तिष्क में जो कि बहुत दिनों से पारिवारिक और अपने मित्रो के सानिध्य में हमने सीखे और जाने | अब हमको श्रेष्ट विचार अपने भीतर धारण करने के लिए श्रेष्ट पुरुषो का सत्संग करना चाहिए| चरों और हम जिस वातावरण से घिरे हुए हैं, वह हमको निचे कि और गिराता हैं | पानी का स्वभाव निचे किरने कि तरफ होता हैं| इसका स्वाभाविक स्वभाव ही एसा हैं जो निचे कि तरफ के कामो के तरफ-निश्क्रष्ट उद्धेश्यो के लिए आसानी से लुढ़क जाता हैं | चारो तरफ का वातावरण जिसमे हमारे कुटुम्बी भी शामिल हैं, मित्र भी शामिल हैं, घर वाले भी शामिल हैं, हमेशा इस बात के लिए दबाव डालते हैं कि हमको किसी भी प्रकार से किसी भी कीमत पर भोतिक सफलताएँ पानी चाहिए | चाहे उसके लिए निति बरतनी पड़े अथवा अनीति का आश्रय लेना पड़े| हर जगह से यही शिक्षण हमको मिलता हैं | सरे वातावरण में इसी तरह कि हवा फेली हुई है और यही गन्दगी हमको भी प्रवाहित करती हैं | हमारे गिरावट के लिए कभी वातावरण विद्यमान हैं |

इनका मुकाबला करने के लिए क्या करना चाहिए ? श्रेष्ठता के मार्ग पर अगर हमको चलना हैं – आत्मोत्कर्ष करना हैं, जो हमारे पास इसी शक्ति भी होनी चाहिए जो पतन कि और घसीट ले जाने वाली इन सत्ताओं का मुकाबला कर सके| इसके लिए एक तरीका हैं के हम श्रेष्ठ मनुष्यों के साथ में संपर्क और सानिध्य बनाये रखे, उनके सत्संग को कायम रखें| यह सत्संग केसे हो सकता हैं ? यह सत्संग केवल पुस्तकों के माध्यम से संभव हैं, क्योंकि विचारशील व्यक्ति हर उस समय बातचीत करने के लिए मिल नहीं सकते | इनमे से बहुत तो इसे हैं जो स्वर्गवासी हो चुके हैं और जो जीवित हैं, वे हमसे इतनी दूर रहते हैं कि उनके पास जाकर के हम उनसे बातचीत करना चाहे जो वह भी हमारे लिए कड़ा कठिन हैं | हम जा नहीं सकते और उनके पास जाये भी तो उनके लिए भी कठिन हैं, क्योंकि प्रत्येक महापुरुष समय कि कीमत को समझता और व्यस्त रहता हैं| इसी हालत में हम लगातार सत्संग केसे कर पाएंगे? कभी साल-तो साल में एक-अध् गनते का सत्संग कर लिया, तो क्या उससे हमारा उददेश्य पूरा हो जायेगा? इसलिए अच्छा तरीका यही हैं कि हम अपने जीवन में नियमित रूप से जेसे अपने कुटुंबी और मित्रो से बात करते हैं, श्रेष्ठ महानुभावो से युग के मनीषियों से बातचीत करने के लिए समय निकले | समय निकलने कि इस प्रक्रिया का नाम हैं – स्वाध्याय |

स्वाध्याय को अध्यात्मिक विकास के लिए अत्यधिक आवश्यकता मन गया हैं | स्वाध्याय में ब्राह्मण ग्रंथो में कहा गया हैं – ” जिस दिन विचारशील आदमी स्वाध्याय नहीं करता उस दिन उसकी संज्ञा चांडाल जेसी होती हैं | स्वाध्याय का महत्त्व भजन से किसी भी प्रकार से कम नहीं हैं| भजन का उददेश्य भी यही हैं कि हमारे विचारों का परिष्कार हो और हम श्रेष्ठ व्यक्तित्व कि और आगे बढे| स्वाध्याय हमारे लिए आवश्यक हैं | स्वाध्याय से हम महापुर्शो को अपना मित्र बना सकते हैं और जब भी जरुरत पड़ती, तब उनसे खुले मन से, खुले दिल से बचित कर सकते हैं| जिस तरीके से शारीर को स्वाच रखने के लिए स्नान करना आवश्यक हैं, करदे धोना आवश्यक हैं, उसी प्रकार से स्वाध्याय के द्वारा, श्रेष्ठ विचारो के द्वारा अपने मन के ऊपर जमने वाले क्षय-कल्मषों को मलिनता को धोना आवश्यक हैं| स्वाध्याय से हमको प्रेरणा मिलती हैं, दिशाए मिलती हैं, मार्गदर्शन मिलता हैं, श्रेष्ठ प्रुरुष हमारे सानिध्य में आते हैं और हमको अपने मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करते हैं, मार्गदर्शन करते हैं| ये सारी अवश्यक्ताये स्वास्थ्य से पूरी होती हैं | इसलिए स्वाध्याय का साधना और भजन के बराबर ही मूल्य और महत्त्व समझा जाना चाहिए|

तीसरी बात जो आत्मिक उन्नति के लिए आवश्यक हैं, उसका नाम हैं – संयम| संयम का अर्थ हैं – रोकथाम | अगर हम रोकथाम करे तो जो हमारी शक्तियों का घोर अपव्यय होता रहता हैं, उसकी बचा सकते हैं | हम अपनी अधिकांश शारीरिक और मानसिक शक्तियों को अपव्यय में नष्ट कर देते हैं, कुमार्ग पर नष्ट कर देते हैं | यदि उनको रोका जा सका होता और उपयोगी मार्ग पर लगाया गया होता तो निश्चित रूप से उन शक्तियों के चमत्कार हमको देखने को मिल सकते थे जो हमारे पास थी| पर हम बर्बादी से कुछ बचा नहीं सके| चार तरह के संयम निग्रहरूप में बाते हए हैं – इन्द्रियनिग्रह, मननिग्रह,समय्निग्रह और अर्थ्निग्रह| इन्द्रियनिग्रह में जिव्हा और कामेन्द्रिय का संयम मुख्या हैं | ये इन्द्रिय हमारी कितनी सारी शक्तियों को नष्ट करती हैं और स्वास्थ्य को किस बुरे तरीके से खोखला करती हैं, यह सभी जानते हैं | इन्द्रियनिग्रह का महत्त्व बताने कि जरुरत नहीं हैं | शारीरिक द्रष्टि से जिनको समर्थ बनाना हो, निरोग और दीर्घजीवी बनाना हो उनको इन्द्रियनिग्रह का महत्व समझना और अपने आप को संयम का अभ्यासी बनाना चाहिए |

Continued……………..

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